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Showing posts from August, 2019

मेरी कठपुतली

कई राक्षसों के बीच दब गई है मेरी इच्छा और आकांक्षा की कठपुतली मेरी जरूरत की डोर उसे जिधर ले जाता है जाना ही पड़ता है कभी कभी राक्षसों के बीच से भाग जाती है कठपुतली अपनी दुनियां में अपनी सभ्यता में मुर्दे ने आंखें खोल दी ऐसे शब्द के प्रभाव से चमक गया लुगदी साहित्य वर्दी वाला गुंडा वो (शा×ला)खद्दर वाला मेरा जमीर धिक्कारता है और मैं दौर के पिछली पंक्ति में खड़ा रह जाता हूँ फिर से दब जाती है राक्षसों के बीच मेरी कठपुतली एक रंगीन समारोह में एक अभिनेता सदी का सबसे बड़ा अभिनेता बन जाता है मेरी कठपुतली फिर से एक बार हलचल करने लगती है आदमी नहीं तो अभिनेता जरूर बन सकता हूँ कुछ दिन बाद मेरी कठपुतली एक देसभक्त के हाथों बिक जाती है जैसे गाय कभी कभी कसाई के हाथों बिक जाती है कठपुतली धम्म... से गिरती है जमीन पर अपनी खुद की जमीन पर जहां से कोई भी रास्ता उसके लिए कहीं नहीं जाती मेरी कठपुतली फिर से बंध जाती है जरुरत की डोर से कई राक्षसों के बीच एक लाश बन कर रह जाती है मेरी कठपुतली

दीवाल घड़ी

(मिथिलांचल में स्त्री की दुर्दसा देख कर) कल ही एक दीवाल घड़ी मैं अपने घर लाया हूँ वह ब.. हू.. त.. खूबसूरत है आकर्षक,मनोहारी और दिल को छू लेने वाली जब समय समय पर उसकी(संगीत)आवाज गूंजती है महल में महल महल नहीं घर मालूम होने लगती है उसे मालूम है कब सुबह छः बजेगा कब दोपहर के एक कब शाम को चार बजेगा और कब रात के नौ यहां तक की देर रात को भी वह अपना संगीत सुनाने के लिए होती है तैयार उसे यह भी मालूम है मैं कब घर लौटा हूँ क्योंकि, देर होने पर बता देती है मैं देर से हूँ हाँ उसे यह नहीं मालूम होती मैं कहाँ जा रहा हूँ? किससे मिलता हूँ? क्या बातें करता हूँ? और कब घर लौटूंगा? उसे मैं अपने महल में लाकर महल को घर बनाकर दीवाल से अटैच कर दिया है बस उसे टंगा रहना है दीवाल से चिपका रहना है अब वह मेरी है मेरा गुलाम

तुम्हारे सोचों के बावजूद

(अयोध्या घटना के तीसरी सुबह) अभी अभी मैं चाँद सितारों की दुनियां से धमाके के साथ धरती पर धम्म हुआ हूँ मैं कहां से बोलूं ? मेरा सर आधा आधा हो गया है मेरे पैर में गहरे जख्म हैं दिल के टुकड़े टुकड़े और हाथ कीचड़ से सराबोर मगर उस कीचड़ में पानी नहीं खून सना है तुम्हारा गर्म और लाल खून मेरे कुछ दांते भी मेरे मुँह से गायब हो गए हैं मेरी जीभ मांस का लोथड़ा बन गया है जिससे मेरी जबान एकदम बंद इससे भी कि मैं पानी के बदले खून पी गया हूँ जरा मुझे पानी दो... हिन्दू हो या मुसलमन देखो... मैं तुम्हारे सोचों के (विकास) बावजूद धरती पर निढाल पडा हूँ

बेगाना

(पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या के समय लिखी गयी कविता )   सर पर रेंग रही है हत्या, पांव तले कुचला है धर्म। इस अनाथ हुए संसार में, किसका कौन सुनेगा मर्म। कोई रोटी के लिए मरते हैं, कोई मरते तख्तों को लेकर विकट समस्या ख़ौफनाक है लुटेरों को लेकर खून जहां दरिया बनता, वह देश नहीं दूसरों का। हम उसी देश के वासी हैं, जहां दया प्रेम नहीं जीता। बृक्ष ज्योंही नभ छूना चाहा, जड़ ही काट दिया उसका। बिखरे तना कर क्या सकता? जब मौत हुआ है जड़ का। बढ़ क्या सकता विकास पथ पर कहीं ना कुछ का ठिकाना। इसी लिए तो कहता हूं यह देश हुआ है बेगाना

बेचारी चिड़िया

ओह! फिर चिड़ियों की माँ चिड़ियों के लिए चुगी चारा ले आई काश! उसके अंगों में चोंच को छोड़ कर ऊंटों की तरह एक और कम से कम एक और परत थैलियों की होती बार बार उसे आनी नहीं पड़ती जानी नहीं पड़ती तब तक जब तक थैली नहीं भरती फिर भरी थैलियां लेकर सिर्फ एक बार आती बच्चों को अच्छी तरह खिलाती खुद भी खाती और आज नहीं जाती जाती तो छुपा के रखती इतना रखती कि फिर जानी नहीं पड़ती आराम फर्माती मगर-बेचारी चिड़िया...