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अनुत्तरित व्यक्ति

वैश्विक महामारी से डर कर फुटपाथ पर लॉक डाउन में भूख से बिलबिलाता गरीब एवं गरीब के बच्चे पांच रूपए का चना ना तो खुद चबाते  और ना ही बच्चे मांगते उसकी माँ अपनी गठरी में  संजोग कर रखते हुए और....खराब समयआने का  इंतज़ार करते करते  यही सोचकर सो जाते हैं कि कोई ना कोई जरूर  आकर उन्हें जगाएंगे खाने का एक पैकेट दे जाएंगे मगर .....  ना तो उनके पास  कोई प्रश्न होता  और ना ही उनके ऊत्तर पुलिस के डंडे खाने से  जब वह जागते हैं तो  उनके प्रश्नों का जबाब ? अपने आंसूओं से दे डालते हैं क्योंकि  वह व्यक्ति अनुत्तरित है ं...? 
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मन ही मन में ...

मन ही मन में कितने दिन यह प्यार जिला कर रखेंगे मंजिल तो कभी मिला नहीं खंडहर में बसेरा बनाएगे बचपन और लडकपन बीता यौवन भी आधा पार करेंगे शरद वसंत बीत गये अब सावन क्या पकड़ के रखेंगे हम आंखों ही आंखों में रह गये गलती अपनी किससे बताएंगे

मेरी पांडुलिपियां

बचने वाला तो बचो

इश्क दरिया है इश्क समंदर भी पत्नी के लिए गधा मगर दूसरों के लिए सिकंदर ही घर में चाय के बदले छाछ पीता हूं आपके घर पिऊंगा काफी सुबह उठता हूं झाड़ू खाता हूँ दोपहर को दारू शाम को होटल से समोसे खा कर घर लौटता हूं सीधा भैंस के घर में सो जाता हूं रात भर टकटकी लगाए पड़ा रहता हूँ कि प्यार की एक बूंद भी गिरे मगर मेरी वो मेरी मौत बनकर गालीओं की करती है बारिश सोचता हूं कल से एक मुहीम चलाऊंगा जो शादीशुदा है वह दुबारा ना हो जो नहीं है कुंवारा रहो शादी का बैंड नहीं बजता है डंके की चोट है वो फंसने वाला फंसता है बचने वाला तो बचो....

वोट फार घाघरा

 हम तुम्हें सफलता देंगे तुम मुझे देह दो लड़कियों अब देर मत कर अपनी कीमत पहचान और आ जाओ समय रहते बाजार में यह शुभ घड़ी अब सिर्फ तुम्हारे लिए है आ जाओ सारी दुनिया के सामने निर्विरोध मेरी बाहों में अपनी जाल बहुत दिनों से फैला रखा था तुम्हें गिरफ्त में लेने के लिए अब समय आ गया है तुम्हारी इज्जत आबरू की धज्जियां उड़ाने की सिर्फ अब तुम्हारी देह की परिभाषा  लिखी जा रही है  देह की कहानी पर  बन रहे हैं फिल्म  देह को ही मिलेंगे  शत प्रतिशत वोट  वोट फार घाघरा

प्रकाशित कथा

कथा गोष्ठी