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मन ही मन में ...

मन ही मन में कितने दिन
यह प्यार जिला कर रखेंगे


मंजिल तो कभी मिला नहीं
खंडहर में बसेरा बनाएगे


बचपन और लडकपन बीता
यौवन भी आधा पार करेंगे


शरद वसंत बीत गये अब
सावन क्या पकड़ के रखेंगे


हम आंखों ही आंखों में रह गये
गलती अपनी किससे बताएंगे


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मेरे अपने हो जाओ

तुम्हारी सांसों के सरगम पर सितारों की तान दूँ जब तुम मेरे अपने हो जाओ मेघाच्छन आकाश ना भी होने पर बरसात के फुहारों का अहसास दूँ जब तुम मेरे अपने हो जाओ हां... मैं कह रहा हूँ दुनिया के सारे प्रतिबन्ध टूट जाएंगे उस पल हमारे अपने कानून चलेंगे दिन को रात रात को दिन सुबह को शाम सूरज को चांद करते चले जायेंगे हवा हीन मौसम में बसंती बयार मधु ना होने पर अमिय सागर में सरावोर होंगे मगर कब ? जब तुम मेरे अपने हो जाओ

मेरी पांडुलिपियां

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