Skip to main content

Posts

Showing posts from July, 2019

मेरे अपने हो जाओ

तुम्हारी सांसों के सरगम पर सितारों की तान दूँ जब तुम मेरे अपने हो जाओ मेघाच्छन आकाश ना भी होने पर बरसात के फुहारों का अहसास दूँ जब तुम मेरे अपने हो जाओ हां... मैं कह रहा हूँ दुनिया के सारे प्रतिबन्ध टूट जाएंगे उस पल हमारे अपने कानून चलेंगे दिन को रात रात को दिन सुबह को शाम सूरज को चांद करते चले जायेंगे हवा हीन मौसम में बसंती बयार मधु ना होने पर अमिय सागर में सरावोर होंगे मगर कब ? जब तुम मेरे अपने हो जाओ

वारिस

(मुंबई महानगर में मजदूरों की जिंदगी देख कर) मैं कौन हूँ? मुझे क्या करना चाहिए? मैं क्या कर रहा हूँ? मैं रोज सुबह उठता हूँ एक मरे हुए स्वप्न के साथ गैरों के शहर में गैरों की तरह आता जाता हूँ राक्षसों के शोषण के बाद जो बच जाता है उससे कुछ जिन्दा के लिए भोजन और एक मरे हुए आदमी के लिए मुश्किल से हो पाता है कफ़न की ब्यवस्था वह जिन्दा.. जिन्दा तभी रहेगा जब मैं जिन्दा रहूँगा मेरी मौत के बाद.. मेरी चित्ता मुझे खुद सजाना पड़ेगा मेरे पास कुछ भी नहीं किसी को देने के लिए मेरा कोई नहीं है-वारिस

बाढ़ आई हुई नदी

स्वयं के सामर्थ्य का नदी को अहसास हुआ बेगवती हुई धार फूटने लगे लहरें.... हिलोरें लेने लगे बढ़ती ही गयी उफान थमती कहाँ स्वप्न का अंबार ज्वार आने लगा मौसमी नदी भरपूर अहसास... सुरक्षित लगा ख्वाबों का ताजमहल वही ख्वाब, जो बाढ़ से परिपूर्ण हर नदी देखती रहती है तट तोड़ दूँ किले ढहा दूँ दुनियां अपने सर्वांग में समा लूँ मगर... दुनियां? कितनी बड़ी है कितना कठोर रहस्यमय... पेचीदा समझ से कितना दूर स्वप्न बुनती नहीं अब स्वप्न दुहराने लगी नदी समझने लगी स्वप्न टूटने लगे नदी उतरने लगी बिखरी हुई नदी।

मैं जानना चाहता हूं !

हर आंखें तुम्हारी तरफ क्यों उठ जाती हैं? हर धड़कन तुम्हारे नाम पर क्यो धड़कने लगता है? हर सांसें तुम्हारे आने पर क्यों महकने लगती है? हर दिल में तुम्हें पाने की क्यों ललक होती है? हर प्रश्न तुम्हारे बारे में क्यों होने लगता है? हर उत्तर तुम सिर्फ तुम्ही क्यों हो? मैं जानना चाहता हूं! क्यों मैं भी हर पल तुम्हें पाने को प्रयत्न करता रहता हूं? क्यों हर बांहें हर वक्त तुम्हारे इंतजार में फैले रहते हैं

अंधकार...!

अंधकार ... पूर्ण अंधकार मखमली सेज पर कोई घिसने लगा झांवा पत्थर चीख... परी चिड़िया अपने घोसलों में नहीं पराये पिंजरों में होती रही कामना नये मुखौटों की मुखौटे की भविष्य की दूसरी, तीसरी,चौथी और कई कई रात एक रात ऐसी आई कि पूरा जल गया-मखमली सेज तीन शब्द सुन पायीं-बस कठमुल्लाओं ने इन तीन लफ्जों पर कभी नहीं गोर फर्माया अब चिड़िया कुछ नहीं बोलती दुनिया बोलती रहती है सिर्फ देखती रहती है पथराई आँखों से अंधकार में

मेरी भावना

दीनबन्धु झा दोस्तों! मेरी मातृ भाषा मैथिली होने के बावजूद हिंदी से मेरा लगाव बचपन से ही है।आज कई पुस्तकों के लेखक अजित आजाद  मुझे जबर्दस्ती मैथिली दुनिया में खींच लिया।उस समय "सगर राति दीप जरय "कथा गोष्ठी में कई बार हिस्सा लिया । प्रखर लेखक कमल मोहन "चुन्नू"अपनी पत्रिका में मेरी कथा"गांधी छाप रंग "प्रकाशित की । ऐसे ही कुछ साहित्य कार महोदय के दिशा निर्देश से कुछ कथा और एक गीतों का कैसेट मैथिली में ही रिलीज हुआ ।  कुछ गायक गायिकाओ के साथ साथ मिलकर रंगारंग मंच का उदघोषक बना । साहित्यकार मित्रों के सहयोग से बंधु पत्रिका का योजना बना । मगर आर्थिक कारणों से हमलोग इसमें सफल नहीं हो सके। उस समय थोड़े धन के लिए मैं तुलसी प्रकाशन और वेद प्रकाश शर्मा के लिए घोस्ट राइटिंग की।भाई हिंदी  बोलकर ,सुन कर मुझे विशुद्ध देशभक्ति का अहसास होता है।एक दिन ऐसा आयेगा की संपूर्ण देश में हिंदी बोली जायेगी। मैं सातवीं वर्ग में पढ़ रहा था तब दुर्गा पूजा के अवसर पर नाटक देख कर गंभीर हो जाता था।उसकी प्रस्तुति, पटकथा, संवाद अदायगी को महसूस करके मैं मगन हो जाता था।वहीं से पहले ...

काव्य वेदना

ऊं ऐं ऊं       हे माता! मैहर वाली, मेरी काव्य चेतना जागृत करते रहेंगे    ऊं ऐं ऊं    ऊ ऐं ऊं              अपनी कृपा दृष्टि सदा बनाए रखेंगे !