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वारिस



(मुंबई महानगर में मजदूरों की जिंदगी देख कर)

मैं कौन हूँ?
मुझे क्या करना चाहिए?
मैं क्या कर रहा हूँ?
मैं रोज सुबह उठता हूँ
एक मरे हुए स्वप्न के साथ
गैरों के शहर में
गैरों की तरह
आता जाता हूँ
राक्षसों के शोषण के बाद
जो बच जाता है उससे
कुछ जिन्दा के लिए भोजन
और एक मरे हुए आदमी के लिए
मुश्किल से हो पाता है
कफ़न की ब्यवस्था
वह जिन्दा..
जिन्दा तभी रहेगा
जब मैं जिन्दा रहूँगा
मेरी मौत के बाद..
मेरी चित्ता मुझे खुद
सजाना पड़ेगा
मेरे पास
कुछ भी नहीं
किसी को देने के लिए
मेरा कोई नहीं है-वारिस

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