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Showing posts from March, 2020

मन ही मन में ...

मन ही मन में कितने दिन यह प्यार जिला कर रखेंगे मंजिल तो कभी मिला नहीं खंडहर में बसेरा बनाएगे बचपन और लडकपन बीता यौवन भी आधा पार करेंगे शरद वसंत बीत गये अब सावन क्या पकड़ के रखेंगे हम आंखों ही आंखों में रह गये गलती अपनी किससे बताएंगे

मेरी पांडुलिपियां

बचने वाला तो बचो

इश्क दरिया है इश्क समंदर भी पत्नी के लिए गधा मगर दूसरों के लिए सिकंदर ही घर में चाय के बदले छाछ पीता हूं आपके घर पिऊंगा काफी सुबह उठता हूं झाड़ू खाता हूँ दोपहर को दारू शाम को होटल से समोसे खा कर घर लौटता हूं सीधा भैंस के घर में सो जाता हूं रात भर टकटकी लगाए पड़ा रहता हूँ कि प्यार की एक बूंद भी गिरे मगर मेरी वो मेरी मौत बनकर गालीओं की करती है बारिश सोचता हूं कल से एक मुहीम चलाऊंगा जो शादीशुदा है वह दुबारा ना हो जो नहीं है कुंवारा रहो शादी का बैंड नहीं बजता है डंके की चोट है वो फंसने वाला फंसता है बचने वाला तो बचो....

वोट फार घाघरा

 हम तुम्हें सफलता देंगे तुम मुझे देह दो लड़कियों अब देर मत कर अपनी कीमत पहचान और आ जाओ समय रहते बाजार में यह शुभ घड़ी अब सिर्फ तुम्हारे लिए है आ जाओ सारी दुनिया के सामने निर्विरोध मेरी बाहों में अपनी जाल बहुत दिनों से फैला रखा था तुम्हें गिरफ्त में लेने के लिए अब समय आ गया है तुम्हारी इज्जत आबरू की धज्जियां उड़ाने की सिर्फ अब तुम्हारी देह की परिभाषा  लिखी जा रही है  देह की कहानी पर  बन रहे हैं फिल्म  देह को ही मिलेंगे  शत प्रतिशत वोट  वोट फार घाघरा

प्रकाशित कथा

कथा गोष्ठी

एक उदघोषक के रूप में 2

एक उदघोषक के रूप में