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मेरी भावना

दीनबन्धु झा

दोस्तों!

मेरी मातृ भाषा मैथिली होने के बावजूद हिंदी से मेरा लगाव बचपन से ही है।आज कई पुस्तकों के लेखक अजित आजाद  मुझे जबर्दस्ती मैथिली दुनिया में खींच लिया।उस समय "सगर राति दीप जरय "कथा गोष्ठी में कई बार हिस्सा लिया । प्रखर लेखक कमल मोहन "चुन्नू"अपनी पत्रिका में मेरी कथा"गांधी छाप रंग "प्रकाशित की । ऐसे ही कुछ साहित्य कार महोदय के दिशा निर्देश से कुछ कथा और एक गीतों का कैसेट मैथिली में ही रिलीज हुआ ।  कुछ गायक गायिकाओ के साथ साथ मिलकर रंगारंग मंच का उदघोषक बना । साहित्यकार मित्रों के सहयोग से बंधु पत्रिका का योजना बना । मगर आर्थिक कारणों से हमलोग इसमें सफल नहीं हो सके। उस समय थोड़े धन के लिए मैं तुलसी प्रकाशन और वेद प्रकाश शर्मा के लिए घोस्ट राइटिंग की।भाई हिंदी  बोलकर ,सुन कर मुझे विशुद्ध देशभक्ति का अहसास होता है।एक दिन ऐसा आयेगा की संपूर्ण देश में हिंदी बोली जायेगी। मैं सातवीं वर्ग में पढ़ रहा था तब दुर्गा पूजा के अवसर पर नाटक देख कर गंभीर हो जाता था।उसकी प्रस्तुति, पटकथा, संवाद अदायगी को महसूस करके मैं मगन हो जाता था।वहीं से पहले मैंने नाटक लिखना प्रारंभ किया, कभी कभी थक जाने पर मेरा एक मित्र इस काम में मेरा सहयोग करता था।वह नया नया दृश्य के बारे में मुझे बताता रहता था।उच्च विद्यालय में शिक्षक के समक्ष निबंध प्रतियोगिता में अव्वल रह कर कई बार पुरस्कृत भी हुआ। छात्रावास में हमारे गुरुदेव स्वर्गीय हरिशचंद्र झा ने सबसे अधिक मेरा मार्गदर्शन किया जो स्वयं भी एक कवि थे । उनकी अनुभव पूर्ण एवं भावनात्मक बातें सुन सुन कर ही मुझ में काव्य गुण समाहित हो गया।इसके लिए मैं उन्हें दिल से धन्यवाद देता हूँ। महाविद्यालय में आते ही कथाकार कर्मेन्दु शिशिर जिनके सानिध्य में मैं कथा लिखने का गुड़ सीखा।पटना में उनके आस पास ही रहता था।साथ ही कई उपन्यास कारों का उपन्यास पढ़ कर मूल रूप से मैं उपन्यासकार बन गया।एक सांस में कई उपन्यासों का नाम ले सकता हूँ मगर सबसे ऊपर धर्मवीर भारती का उपन्यास "गुनाहों का देवता " को मानता हूँ,क्योंकि मैं सबसे अधिक प्रेम और मानवीय भावनाओं का कायल हूँ।यही मेरी रचना का आधार भी है।बाद में साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता साहित्यकार जीवकांत बाबु अनुभवी कवि कथाकार डॉ नारायणजी के संपर्क में रहा।कुछ दिन बाद गीत के तरफ प्रेरित हुआ।देश भर में कई कवि सम्मेलन, कथा गोष्ठी में शामिल हो कर देशी विदेशी लेखकों के संपर्क में आया।1998,1999 में मुम्बई में फिल्मों के लिए संघर्ष के दौरान बहुत ही कड़ुवा अनुभव प्राप्त किया।उसमें मेरे साथ एक महिला मित्र जिसका नाम इस समय नहीं ले पाऊंगा और साथ ही मेरे दिवंगत दोस्त शम्भूनाथ झा प्रेमन भी थे।इस दौरान इसी अनुभव के आधार पर मैंने एक उपन्यास लिखा जो इसी ब्लॉग से आप पढ़ पाएंगे।अभी कुछ कविताऐं आपके लिए प्रस्तुत है।मुझे प्रोत्साहित करने के लिए मेरे ब्लॉग को जरूर पढ़ें।धन्यबाद!
 संपर्क - 9661357849
jhadinbandhulic@gmail.com

वहम मैं खूब हुं करता रहम की द्वार खाली है।   
आपको आप ना कहता आपका नाम जाली है।।


           ए दोस्त गम ए दिल अफसाना कौन सुने
              किसी की अपनी ना हो तो कहना

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तुम्हारी सांसों के सरगम पर सितारों की तान दूँ जब तुम मेरे अपने हो जाओ मेघाच्छन आकाश ना भी होने पर बरसात के फुहारों का अहसास दूँ जब तुम मेरे अपने हो जाओ हां... मैं कह रहा हूँ दुनिया के सारे प्रतिबन्ध टूट जाएंगे उस पल हमारे अपने कानून चलेंगे दिन को रात रात को दिन सुबह को शाम सूरज को चांद करते चले जायेंगे हवा हीन मौसम में बसंती बयार मधु ना होने पर अमिय सागर में सरावोर होंगे मगर कब ? जब तुम मेरे अपने हो जाओ

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