(पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या
के समय लिखी गयी कविता )
सर पर रेंग रही है हत्या,
पांव तले कुचला है धर्म।
इस अनाथ हुए संसार में,
किसका कौन सुनेगा मर्म।
कोई रोटी के लिए मरते हैं,
कोई मरते तख्तों को लेकर
विकट समस्या ख़ौफनाक
है लुटेरों को लेकर
खून जहां दरिया बनता,
वह देश नहीं दूसरों का।
हम उसी देश के वासी हैं,
जहां दया प्रेम नहीं जीता।
बृक्ष ज्योंही नभ छूना चाहा,
जड़ ही काट दिया उसका।
बिखरे तना कर क्या सकता?
जब मौत हुआ है जड़ का।
बढ़ क्या सकता विकास पथ पर
कहीं ना कुछ का ठिकाना।
इसी लिए तो कहता हूं
यह देश हुआ है बेगाना
के समय लिखी गयी कविता )
सर पर रेंग रही है हत्या,
पांव तले कुचला है धर्म।
इस अनाथ हुए संसार में,
किसका कौन सुनेगा मर्म।
कोई रोटी के लिए मरते हैं,
कोई मरते तख्तों को लेकर
विकट समस्या ख़ौफनाक
है लुटेरों को लेकर
खून जहां दरिया बनता,
वह देश नहीं दूसरों का।
हम उसी देश के वासी हैं,
जहां दया प्रेम नहीं जीता।
बृक्ष ज्योंही नभ छूना चाहा,
जड़ ही काट दिया उसका।
बिखरे तना कर क्या सकता?
जब मौत हुआ है जड़ का।
बढ़ क्या सकता विकास पथ पर
कहीं ना कुछ का ठिकाना।
इसी लिए तो कहता हूं
यह देश हुआ है बेगाना
Best
ReplyDelete