(मिथिलांचल में स्त्री की दुर्दसा देख कर)
कल ही
एक दीवाल घड़ी
मैं अपने घर लाया हूँ
वह ब.. हू.. त.. खूबसूरत है
आकर्षक,मनोहारी
और दिल को छू लेने वाली
जब समय समय पर
उसकी(संगीत)आवाज
गूंजती है महल में
महल महल नहीं
घर मालूम होने लगती है
उसे मालूम है
कब सुबह छः बजेगा
कब दोपहर के एक
कब शाम को चार बजेगा
और कब रात के नौ
यहां तक की
देर रात को भी वह
अपना संगीत
सुनाने के लिए
होती है तैयार
उसे यह भी मालूम है
मैं कब घर लौटा हूँ
क्योंकि, देर होने पर
बता देती है
मैं देर से हूँ
हाँ उसे यह नहीं मालूम होती
मैं कहाँ जा रहा हूँ?
किससे मिलता हूँ?
क्या बातें करता हूँ?
और कब घर लौटूंगा?
उसे मैं
अपने महल में लाकर
महल को घर बनाकर
दीवाल से अटैच कर दिया है
बस उसे टंगा रहना है
दीवाल से चिपका रहना है
अब वह मेरी है
मेरा गुलाम
कल ही
एक दीवाल घड़ी
मैं अपने घर लाया हूँ
वह ब.. हू.. त.. खूबसूरत है
आकर्षक,मनोहारी
और दिल को छू लेने वाली
जब समय समय पर
उसकी(संगीत)आवाज
गूंजती है महल में
महल महल नहीं
घर मालूम होने लगती है
उसे मालूम है
कब सुबह छः बजेगा
कब दोपहर के एक
कब शाम को चार बजेगा
और कब रात के नौ
यहां तक की
देर रात को भी वह
अपना संगीत
सुनाने के लिए
होती है तैयार
उसे यह भी मालूम है
मैं कब घर लौटा हूँ
क्योंकि, देर होने पर
बता देती है
मैं देर से हूँ
हाँ उसे यह नहीं मालूम होती
मैं कहाँ जा रहा हूँ?
किससे मिलता हूँ?
क्या बातें करता हूँ?
और कब घर लौटूंगा?
उसे मैं
अपने महल में लाकर
महल को घर बनाकर
दीवाल से अटैच कर दिया है
बस उसे टंगा रहना है
दीवाल से चिपका रहना है
अब वह मेरी है
मेरा गुलाम
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