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तुम्हारे सोचों के बावजूद

(अयोध्या घटना के तीसरी सुबह)

अभी अभी
मैं चाँद सितारों की दुनियां से
धमाके के साथ
धरती पर धम्म हुआ हूँ

मैं कहां से बोलूं ?
मेरा सर
आधा आधा हो गया है
मेरे पैर में
गहरे जख्म हैं
दिल के टुकड़े टुकड़े
और हाथ कीचड़ से सराबोर

मगर उस कीचड़ में
पानी नहीं
खून सना है
तुम्हारा गर्म और लाल खून
मेरे कुछ दांते भी
मेरे मुँह से गायब हो गए हैं
मेरी जीभ
मांस का लोथड़ा बन गया है
जिससे मेरी जबान
एकदम बंद

इससे भी कि
मैं पानी के बदले
खून पी गया हूँ

जरा मुझे पानी दो...
हिन्दू हो या मुसलमन
देखो...
मैं तुम्हारे
सोचों के (विकास) बावजूद
धरती पर निढाल पडा हूँ

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