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कामना

          काश           मेरेे तरह सब के दिलों में           बाहर की भांति           दिल की गहराइयों में           प्रेम ठहरने को           एक विशाल बंगला होता           जिसमें दरवाजे आंगन के साथ           बंद शयनकक्ष होता           जहाँ दो दिल मिल कर           गुपचुप बातें करते           उसी भांति चिर काल तक           करते रहते           जुदाई           जिसका नाम ना लेते          ,यही मेरी कामना!                           

कयामत है

पुरुष बन गया डकैत औरत करने लगीं माडलिंग हलांकि डकैत की दीवानी फ्रांस की युवती माडलिंग का दीवाना भारतीय युवक अखबार में खबर है- "भारत में भारतीय भाषाओं शब्दो ंका पर गया है अकाल" "जबान डूब गया है बाढ़ में" "कवि आ गये हैं महामारी के चपेट में" "चटक मटक खाने वालों के बीच  हैजा का नामोनिशान नहीं लिखने और कहने के लिए अभी भी बचा है बहूत कुछ दिखाने के लिए कुछ भी नहीं फिल्मों में जैसे ही नायिकाओं ने मटकाये कूल्हे गायिका ने गाया चोली वाला गीत युवकों ने मारा सीटी युवती बोलीं 'हाउ कयूट' प्रौढ स्त..ब. सांस खींच कर बच्चे ने मारा ताली..! बुढा बोला-हाय हाय कौन जमाना आ या हा य चोली के पीछे कयामत है

सादर आमंत्रित

तुम हंसी नहीं  कोई फूल खिला है  तेरी नजर नहीं कोई तीर लगा है

अ हटा दो

ब्यक्ति बैठ जाता है थक कर  कभी कभी पंछी लौट आते उड़ना छोड़ कभी कभी मशीन  बंद कर देती  काम करना कभी कभी हवा  थोड़ी भी नहीं बहती  कभी कभी सब कुछ शिथिल हो जाता है कभी कभी यह सब  तूफान  आने से पहले की  खामोशी है असफलता  किसी भारी सफलता की  पूर्व सूचना असफलता से अ हटा दो अंतर  इतना ही होता है  कभी कभी

मेरी कठपुतली

कई राक्षसों के बीच दब गई है मेरी इच्छा और आकांक्षा की कठपुतली मेरी जरूरत की डोर उसे जिधर ले जाता है जाना ही पड़ता है कभी कभी राक्षसों के बीच से भाग जाती है कठपुतली अपनी दुनियां में अपनी सभ्यता में मुर्दे ने आंखें खोल दी ऐसे शब्द के प्रभाव से चमक गया लुगदी साहित्य वर्दी वाला गुंडा वो (शा×ला)खद्दर वाला मेरा जमीर धिक्कारता है और मैं दौर के पिछली पंक्ति में खड़ा रह जाता हूँ फिर से दब जाती है राक्षसों के बीच मेरी कठपुतली एक रंगीन समारोह में एक अभिनेता सदी का सबसे बड़ा अभिनेता बन जाता है मेरी कठपुतली फिर से एक बार हलचल करने लगती है आदमी नहीं तो अभिनेता जरूर बन सकता हूँ कुछ दिन बाद मेरी कठपुतली एक देसभक्त के हाथों बिक जाती है जैसे गाय कभी कभी कसाई के हाथों बिक जाती है कठपुतली धम्म... से गिरती है जमीन पर अपनी खुद की जमीन पर जहां से कोई भी रास्ता उसके लिए कहीं नहीं जाती मेरी कठपुतली फिर से बंध जाती है जरुरत की डोर से कई राक्षसों के बीच एक लाश बन कर रह जाती है मेरी कठपुतली

दीवाल घड़ी

(मिथिलांचल में स्त्री की दुर्दसा देख कर) कल ही एक दीवाल घड़ी मैं अपने घर लाया हूँ वह ब.. हू.. त.. खूबसूरत है आकर्षक,मनोहारी और दिल को छू लेने वाली जब समय समय पर उसकी(संगीत)आवाज गूंजती है महल में महल महल नहीं घर मालूम होने लगती है उसे मालूम है कब सुबह छः बजेगा कब दोपहर के एक कब शाम को चार बजेगा और कब रात के नौ यहां तक की देर रात को भी वह अपना संगीत सुनाने के लिए होती है तैयार उसे यह भी मालूम है मैं कब घर लौटा हूँ क्योंकि, देर होने पर बता देती है मैं देर से हूँ हाँ उसे यह नहीं मालूम होती मैं कहाँ जा रहा हूँ? किससे मिलता हूँ? क्या बातें करता हूँ? और कब घर लौटूंगा? उसे मैं अपने महल में लाकर महल को घर बनाकर दीवाल से अटैच कर दिया है बस उसे टंगा रहना है दीवाल से चिपका रहना है अब वह मेरी है मेरा गुलाम

तुम्हारे सोचों के बावजूद

(अयोध्या घटना के तीसरी सुबह) अभी अभी मैं चाँद सितारों की दुनियां से धमाके के साथ धरती पर धम्म हुआ हूँ मैं कहां से बोलूं ? मेरा सर आधा आधा हो गया है मेरे पैर में गहरे जख्म हैं दिल के टुकड़े टुकड़े और हाथ कीचड़ से सराबोर मगर उस कीचड़ में पानी नहीं खून सना है तुम्हारा गर्म और लाल खून मेरे कुछ दांते भी मेरे मुँह से गायब हो गए हैं मेरी जीभ मांस का लोथड़ा बन गया है जिससे मेरी जबान एकदम बंद इससे भी कि मैं पानी के बदले खून पी गया हूँ जरा मुझे पानी दो... हिन्दू हो या मुसलमन देखो... मैं तुम्हारे सोचों के (विकास) बावजूद धरती पर निढाल पडा हूँ