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बाढ़ आई हुई नदी


स्वयं के सामर्थ्य का
नदी को अहसास हुआ
बेगवती हुई
धार फूटने लगे
लहरें....
हिलोरें लेने लगे
बढ़ती ही गयी
उफान थमती कहाँ
स्वप्न का अंबार
ज्वार आने लगा
मौसमी नदी
भरपूर अहसास...
सुरक्षित लगा
ख्वाबों का ताजमहल
वही ख्वाब, जो
बाढ़ से परिपूर्ण
हर नदी देखती रहती है
तट तोड़ दूँ
किले ढहा दूँ
दुनियां अपने
सर्वांग में समा लूँ
मगर... दुनियां?
कितनी बड़ी है
कितना कठोर
रहस्यमय...
पेचीदा
समझ से कितना दूर
स्वप्न बुनती नहीं अब
स्वप्न दुहराने लगी
नदी समझने लगी
स्वप्न टूटने लगे
नदी उतरने लगी
बिखरी हुई नदी।


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